सतना | जिले के उचेहरा वन परिक्षेत्र अंतर्गत परसमनिया क्षेत्र के जंगल और राजस्व भूमि में एक बार फिर अवैध उत्खनन का दौर तेजी के साथ शुरू हो गया है। बेहद सुनियोजित ढंग से यहां चल रहे पत्थर पटिया के अवैध उत्खनन से खनन माफिया न केवल जंगल और कुदरती सौंदर्य को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि शासन को भी क्षति पहुंचा रहा है। यहां से रोजाना पत्थर पटिया की खेप यूपी -बिहार तक भी भेजी जा रही है लेकिन रोकथाम और कार्यवाही के लिए तैनात किये गए जिम्मेदार भी अपने हितलाभ साध कर खामोशी से बैठे हुए हैं।
ठेंगे पर पाबंदी, खनन माफिया का है जोर जारी, जिम्मेदारों ने ओढ़ी खामोशी
अवैध उत्खनन के मामले में जमाने से सुर्खियों में छाये रहने वाले परसमनिया क्षेत्र में एक बार फिर खनन माफिया का बोलबाला है। परसमनिया उप वन परिक्षेत्र में दर्जनों ठीहे खनन माफिया ने खोल और खुलवा रखे हैं। सखौहा में तो खनन माफिया ने न वन भूमि को छोड़ा है और न ही राजस्व भूमि उसके कहर से बच पाई है। मजदूर लगा कर दिन भर उत्खनन कराया जाता है। खदानों में मजदूरों से ठेके पर भी पटिया तुड़वाई -निकलवाई जाती है और फिर शाम तक में तैयार माल को ट्रैक्टर से लिफ्ट कर एक ठीहे तक पहुंचा दिया जाता है और फिर पत्थर पटिया की खेप ट्रक में लोड कर यूपी बिहार भेज दी जाती है।
अवैध उत्खनन के मामले में जमाने से सुर्खियों में छाये रहने वाले परसमनिया क्षेत्र में एक बार फिर खनन माफिया का बोलबाला है। परसमनिया उप वन परिक्षेत्र में दर्जनों ठीहे खनन माफिया ने खोल और खुलवा रखे हैं। सखौहा में तो खनन माफिया ने न वन भूमि को छोड़ा है और न ही राजस्व भूमि उसके कहर से बच पाई है। मजदूर लगा कर दिन भर उत्खनन कराया जाता है। खदानों में मजदूरों से ठेके पर भी पटिया तुड़वाई -निकलवाई जाती है और फिर शाम तक में तैयार माल को ट्रैक्टर से लिफ्ट कर एक ठीहे तक पहुंचा दिया जाता है और फिर पत्थर पटिया की खेप ट्रक में लोड कर यूपी बिहार भेज दी जाती है।
क्षेत्रीय लोग और सूत्र बताते हैं कि रोजाना सखौहा क्षेत्र से आधा दर्जन ट्रक लोड हो कर भेजे जाते हैं। यहां दर्जनों स्थानों पर चल रही छोटी बड़ी खदानों के पीछे कई बड़े चेहरे भी हैं। पंचायतों के प्रतिनिधि और सरकारी विभागों से जुड़े लोग भी इस दो नम्बरी कारोबार में शामिल हैं। कोई खुद अवैध उत्खनन करा रहा है तो कोई प्रकृति के इन दुश्मनों से अपना हिस्सा वसूल कर आंख और कान बंद किये बैठा है। इस खेल में यहां के लीजधारक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
पीएम आवास की आड़
जगह जगह पटिया -पत्थर तोड़ रहे लोग इस अवैध कारोबार को भी सरकारी योजना से जोड़ने से नहीं हिचकिचा रहे। पीएम आवास योजना में पटिया की उपयोगिता का बहाना बना कर कमाई की जा रही है। कोई भी सवाल करने पर तपाक से पीएम आवास का नाम ले लिया जाता है और मजदूर यह बताने लगते हैं कि वे अपने घर के निर्माण के लिए ऐसा कर रहे हैं।
जगह जगह पटिया -पत्थर तोड़ रहे लोग इस अवैध कारोबार को भी सरकारी योजना से जोड़ने से नहीं हिचकिचा रहे। पीएम आवास योजना में पटिया की उपयोगिता का बहाना बना कर कमाई की जा रही है। कोई भी सवाल करने पर तपाक से पीएम आवास का नाम ले लिया जाता है और मजदूर यह बताने लगते हैं कि वे अपने घर के निर्माण के लिए ऐसा कर रहे हैं।
वन अमला भी यह सब देख कर खामोश है और पेंच फंसने पर राजस्व भूमि बता कर पल्ला झाड़ने से बाज नहीं आता जबकि खनिज विभाग के लोगों का भी कोई खौफ यहां किसी को नहीं है। अवैध खदान चलाने वाले खनन माफिया,उनके गुर्गे और यहां तक कि मजदूर भी बेझिझक यह कहते सुने जा सकते हैं कि सब कुछ सेट है। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों उचेहरा थाना पुलिस ने सख्ती की थी लेकिन बाद में वहां भी सब कुछ शायद मैनेज हो गया।
नगर निगम में भी खपत
पटिया की खपत सतना में भी कम नहीं है। नगर निगम द्वारा नाली के निर्माण में पत्थर पटिया का इस्तेमाल भी किये जाने की अनिवार्यता लागू किये जाने के बाद पटिया की अवैध खेप यहां भी खूब खप रही है। नगर निगम के तमाम ठेकेदार अवैध पटिया की खेप उतरवा रहे हैं। हालांकि कुछ वाहनों के साथ पिट पास भी भेज दिए जाते हैं लेकिन यह तभी काम में लाये जाते हैं जब कहीं कोई रोक टोक हो या पकडे जाने का संकट आ खड़ा हुआ हो।
पटिया की खपत सतना में भी कम नहीं है। नगर निगम द्वारा नाली के निर्माण में पत्थर पटिया का इस्तेमाल भी किये जाने की अनिवार्यता लागू किये जाने के बाद पटिया की अवैध खेप यहां भी खूब खप रही है। नगर निगम के तमाम ठेकेदार अवैध पटिया की खेप उतरवा रहे हैं। हालांकि कुछ वाहनों के साथ पिट पास भी भेज दिए जाते हैं लेकिन यह तभी काम में लाये जाते हैं जब कहीं कोई रोक टोक हो या पकडे जाने का संकट आ खड़ा हुआ हो।
प्रतिबंध के बावजूद ब्लास्टिंग,ड्रिलिंग
ब्लास्टिंग पर पाबंदी है लेकिन यहां मनमानी पर उतारू खनन माफिया को इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। बेखौफ होकर यहां ब्लास्टिंग भी की जा रही है और कम्प्रेशर के जरिये ड्रिलिंग भी की जा रही है। मशीन लगा कर मजदूर बड़ी बड़ी चट्टानें काट कर देखते ही देखते टुकड़ों में बांट रहे हैं और फिर पटिया निकाल कर भंडारण कर रहे हैं। एक एक खदान का नजारा ऐसा दिखता है जैसे जंगल के अंदर को फैक्ट्री लगा रखी गई हो।
ब्लास्टिंग पर पाबंदी है लेकिन यहां मनमानी पर उतारू खनन माफिया को इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। बेखौफ होकर यहां ब्लास्टिंग भी की जा रही है और कम्प्रेशर के जरिये ड्रिलिंग भी की जा रही है। मशीन लगा कर मजदूर बड़ी बड़ी चट्टानें काट कर देखते ही देखते टुकड़ों में बांट रहे हैं और फिर पटिया निकाल कर भंडारण कर रहे हैं। एक एक खदान का नजारा ऐसा दिखता है जैसे जंगल के अंदर को फैक्ट्री लगा रखी गई हो।
90 रु का खेल
मजदूर बताते हैं कि उनके द्वारा निकाली गई पटिया के उन्हें 30 से 40 रुपए मिलते हैं जबकि एक पटिया की बिक्री सवा सौ रुपए तक में की जाती है। पटिया अपने ठीहे पर ही रखे रहते हैं जिसे क्षेत्र के लाइसेंसी ठेकेदार अपना वाहन भेज कर उठवा लेते है। कई जगह तो ऐसी भी खदाने हैं जहां बड़े पैमाने पर पटिया निकाली जा रही हैं ,उन ठीहों से वाहन का इंतजाम भी उस खदान को चलने वालों द्वारा ही भेजा जाता है।
मजदूर बताते हैं कि उनके द्वारा निकाली गई पटिया के उन्हें 30 से 40 रुपए मिलते हैं जबकि एक पटिया की बिक्री सवा सौ रुपए तक में की जाती है। पटिया अपने ठीहे पर ही रखे रहते हैं जिसे क्षेत्र के लाइसेंसी ठेकेदार अपना वाहन भेज कर उठवा लेते है। कई जगह तो ऐसी भी खदाने हैं जहां बड़े पैमाने पर पटिया निकाली जा रही हैं ,उन ठीहों से वाहन का इंतजाम भी उस खदान को चलने वालों द्वारा ही भेजा जाता है।

Comments
Post a Comment